भारत में स्वास्थ्य सेवाओं कि स्थिति के बारे में जितना रोना रोया जाता है उतना उस शिक्षा के बारे में नहीं जो एक प्रशिक्षित डॉक्टर बनाती है. स्वास्थ्य शिक्षा एक महत्वपूर्ण विषय है और इसके व्यापक और गुणात्मक पहुँच के लिये गंभीर प्रयासों की ज़रूरत है. अगर हमें लोगों के लिये अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएँ चाहिए तो हमें अपनी आबादी के हिसाब से प्रशिक्षित डॉक्टरों को तैयार करना होगा. वर्तमान परिदृश्य में चिकित्सा शिक्षा कि जो स्थिति है उससे हमें अपने ज़रूरत के हिसाब के डॉक्टर मिल जायेंगे इसकी उम्मीद मै नहीं करता.
हमारे यहाँ के अधिकांश शिक्षण संस्थान जिस तरह की शिक्षा मुहैया करवा रहे है उससे केवल डिग्रीधारी लोगों की भीड़ निकल रही है. अधिकांश ज़गहो पर पढाने के नाम पर केवल खानापूर्ति हो रही है. सरकार पर डॉक्टरों की बड़ी फौज खड़ी करने का इतना दबाव है कि उसने कुछ बहुत ही ज़रुरी बातों पर अपनी आँखें मूँद रखी है . आधारभूत संरचनाओं का भारी आकाल है . कही शिक्षक नहीं है ,कही प्रयोगशालाएं नहीं है, कही पढाने के लिये भवन नहीं है . प्रायवेट संस्थानों का तो और बुरा हाल है . उनका बस चले तो वे केवल डोनेशन ले कर ही डिग्री बाँट दें ,पढ़ने की सुविधा तो वे मजबूरी में देते है. खैर ये सब तो वो बातें है जो सबको दिख सकती हैं.
एक मेडिकल छात्र होने के नाते मै थोडा और गहराई से देखता हूँ .पिछले ११ साल से मैने इस व्यवस्था को बहुत नजदीक से देखा है. मै यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि समय के साथ इस शिक्षा की गुणवत्ता में व्यापक कमी आई है. पढाई का स्तर गिरा है और हम समय के साथ नहीं चल पायें है. कुछेक प्रतिष्ठित संस्थानों को छोड़ दे तो हम अपनी इस स्थिति पर निराश हुए बिना नहीं रह पाएंगे. अच्छे संस्थान तो इस देश में मात्र गिने चुने है और उनसे निकलने वाले अधिकांश छात्र या तो पैसों कि लालच में या और अच्छी शिक्षा के लिये विदेश चले जाते है या अच्छी जिंदगी कि चाह लिये बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों को अपना लेते है .दूसरे दर्जे के अधिकांश संस्थानों से जो डॉक्टर निकलते है वे भारत के छोटे बड़े शहरों में ही खप जाते है .हमारी बड़ी आबादी जो गांवों में रहती है उनके पास केवल अर्धप्रशिक्षित लोग ही पहुंचते है और वो भी मजबूरी में . ये लोग भी हमेशा वहा से बहार निकलने कि जुगत में रहते है जहाँ इस भ्रष्ट्राचारी तंत्र से उन्हें आसानी से भागने में मदद भी मिल जाती है .
अब हमें यह बिलकुल साफ दीखता है कि सरकार धीरे-धीरे अपने हाथ खींच रही है. लोगों कि स्वास्थ्य सुविधा और मेडिकल शिक्षा को बाज़ार के भरोसे छोड़ दिया गया है आधारभूत सुविधाओं और कुशल शिक्षकों कि कमी के कारण अर्धप्रशिक्षित और लगभग अप्रशिक्षित लोग इन कारखानों (संस्थाओं) से निकल रहे है. उच्च शिक्षा में आरक्षण ने इस कोढ़ में खाज का काम किया है. मै व्यक्तिगत तौर पे ऐसे लोगों को जानता हू जो केवल आरक्षण की वज़ह से यहाँ पहुँचते है औए हर कदम पे आरक्षण कि सुविधा के कारण ही यहाँ से निकल भी जाते है. इनमे से अधिकांश लोगों के तथ्यात्मक और प्रायोगिक ज्ञान इतने निम्न दर्जे के होते है कि मै डर जाता हूँ. मुझे ये कल्पना ही भयावह लगती है कि ऐसे लोग बाहर जायेंगे और लोगों कि चिकित्सा (न जाने कैसे) करेंगे . पर मुझे पता है ये करेंगे और अगर किसी का नुकसान होगा तो वो कोई गरीब और मजबूर ही होगा क्योकि बड़े और पैसे वालों के लिये तो बड़े और प्रशिक्षित डॉक्टर हमेशा मौजूद रहेंगे. हमारी सरकार को इन बातों से कुछ लेना देना नहीं है क्योकि हम जिसे सरकार कहते है वो अपना इलाज़ केवल विदेशों में ही करवाते है (चाहे वे डॉक्टर यही के क्यों न हो).
इस पेशे में अब ऐसे लोगों कि भरमार हो गयी है जो चिकित्सा और मानव स्वास्थ्य को केवल कमाई का जरिया मानते है. चिकित्सा सेवा में ऐसे लोग ही अब प्रमुखता से है जो अपने संस्कारगत गुणों के कारण व्यापार को ही सर्वप्रमुख मानते है. मेडिकल कालेजो में वैसे ही लोग आ पाते है जिनके पास पैसा है और वे उसे अपनी डिग्री के लिये खर्च कर सकते हों . पैसे का स्रोत अधिकतर काला धन ही होता है जो हमारे निजी शिक्षण संस्थान आसानी से डोनेशन के रूप में पचा जाते है . ये व्यापारी जब अपना पैसा लगाते है तो डिग्री मिलने के बात उसे इसी समाज से वसूल भी करते है और अंततः नीचे का आम आदमी ही पीसता है और सबके लिये स्वास्थ्य एक सपना बनी रहती है.
यह सब स्वास्थ्य के प्रति सरकारी ढुलमुल और उपेक्षापूर्ण नीति के कारण ही संभव हुआ है. हमारे भाग्यविधाता देश को कितनी आतंरिक और बाहरी आतंको से डराकर हमारा रक्षा खर्च बढ़ाते है और मोटी दलाली के ज़रिये उसे अपने जेब में डाल लेते है. स्वास्थ्य क्षेत्र हमेशा की तरह उपेक्षित रहता है और इस पर हमेशा खर्च कम कर दिया जाता है बस इसीलिए कि यह कम कमाऊ है इसमें दलाली कम है . जनता को दिखने के लिये बिना आधारभूत संरचनाओं के बिना ही अप्रशिक्षित लोगों की फौज खडा कर ली जाती है और उन्हें गरीबों की ओर छोड़ दिया जाता है जिससे उनकी हालत और बदतर होती जाती है. इस (कहने को ) लोकतान्त्रिक समाज में जनता का स्वास्थ्य सरकार कि ज़िम्मेदारी है इसे सत्ता में बैठे अंधे लोगों को समझाना होगा वरना पहले से बीमार यह लोकतंत्र और कमज़ोर होगा.